रविवार, 12 जून 2011

रामदेव की रामलीला ख़त्म

बाबा रामदेव ने  देश में अपना नाम योगगुरु योग साधक के रूप में बखूबी कमाया और इसमें किसी भी ब्यक्ति या किसी राजनैतिक पार्टी को कोई परेशानी नहीं थीं ! लेकिन अचानक से बाबा रामदेव को इस देश और इसकी जनता की चिंता सताने लगी और वो कूद पड़े देश से भ्रटाचार मिटाने के लिए जो की अपने आप में एक बड़ा ही निक काम था लेकिन ऐसा क्या हुआ की अचानक से उन पर या अन्न शन्न कर्ताओं पर रात के २बजे पुलिसिया कहर टूट पड़ता हे ? क्या बाबा रामदेव का अन्न शन्न देश की सतासीन पार्टी को अन्ना के अन्न शन्न की तरह मजबूत नहीं लगा या इसके पीछे बाबा की दोगली निति ही उनके लिए और उनके अन्न शन्न के लिए खतरा बन गयी ! दोगली निति इसलिए की जब बाबा ने सरकार के साथ समझोता कर लिया की वो अन्न शन्न तोड़ देंगें और बदले में सरकार उनको उनकी मांगों के मुताबिक सरकार मान गयी, तो क्या कारन था जो  बाबा अन्न शन्न जारी रखना चाहतें थे कहीं ये तो नहीं था की देश भर से हजारों की संख्या में लोगों का रामदेव की इस भूख हड़ताल में आना रामदेव ने अपनी मान और मर्यादा का मुदा बना लिया था की कहीं जनता अपने आपको ठगा महसूस न करे की हम लोगों को बुलाकर खुद अन्दर खाने बात कर स्वहित पूरा होने पर अन्न शन्न ख़त्म कर दिया , पर ऐसा भी होता तो जब पुलीस वहां पहुंची तो बाबा के चहरे से हवाइयां उड़तीं तो पुरे देश ने साफ़ देखीं हैं कारन जो कुछ भी रहा हो इस घटना से जहाँ सरकार का नुकसान हुआ तो लोगों में ये बात भी सामने आगयी की हर कोई महात्मा गांधी और अन्ना नहीं बन सकता? अच्छा हुआ की राम देव ने अन्न शन्न तोड़ दिया नहीं तो उनको शायद इससे भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती ! मुझे लेकिन आज के युवा की सोच पर बड़ा ही तरस आता है हम लोग आज भी गुलामी की जिंदगी से बहार नहीं लिकल पायें हैं बाबा ने चाहे इस मुहीम को जेसे भी chalya हो क्या आज जो कुछ भी sarakaar कर rahi हे sahi है क्या कोई इस देश में अपने हक़ के लिए लड़ना गुनाह है ? क्या हम सब लोगों को एक बार फिर से एक होने की जरुरत नहीं है अगर हे तो इसके ऐसे बाबा रामदेव जेसे ही कोई न झुकने वाली मुहीम ही चलानी परेगी नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब एक बार फिर हम लोग इन भ्रष्ट राजनेता और अधिकारीयों के गुलाम अपने ही देश में अपनों के द्वारा बना दिए जायेंगे !