शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

क्या ये आज़ादी के बाद की गुलामी है?

देश के  युवा युवतियां  आज एक ही सुर में आवाज को बुलंद करने की एक नाकाम सी कोशिश में लगे हैं ! लेकिन, क्या ये" पहल" एक मिल का पत्थर बन पाएगी ? इस तरह के कई सवाल मेरे दिलों दिमाग में घूमते रहतें हें !जी हाँ ! में बात कर रहा हूँ हम लोगों की जो इस देश रहतें हैं . जहाँ पर कई महापुरुषों ने जनम लिया है और कई महान हस्तिओं ने इस देश के लिए अपना खून पानी की तरह बहाया है . क्या सही मायने में यही उनकी महनत  का इनाम होना चाहिए ? की जो देश किसी ज़माने में एक सोने की चिडया के नाम से विश्व विख्यात था क्या वो आज नहीं हे ? अब इसका खुलासा तो विकिलेक ने कर ही दिया हे . भला हो उस इंसान का जो दुनियां के सभी गैर क़ानूनी तरीके से धन कमा रहे धनकुबेरों के विषय में लोगों को जानकारी दे रहा  हैं . लेकिन हम हैं  की अब भी अपनी आवाज को बुलंद करने में लगें हें . क्यों नहीं हम इस आवाज को इतना बुलंद करते की देश के  इन भ्रष्ट लोगों के कानों के परदे तक हिल जाएँ और इस कदर हिले की इन भ्रष्ट लोगों की दिमाग की नसें तक हिल जाये और फट जाएँ . आखिर हम लोग कब तक अपने हक़ की रोटी को इन गदारों से भीख  के रूप में मागते रहेगें . एक बिदेशी बैंक में  जमा ये कला धन किसका है देश का हे क्योंकि  इन लोगों ने इसको देश से चोरी करके चुराया है . और चोर को पकडवाने के लिए कोई आप से आज कह रहा है और हम हैं की उस चोर की चोरी पर  पर्दा ढाल रहे हें ये कह कर की नहीं इनका नाम सामने न आने पाए . हम लोगों में से कितने लोग होंगे जो एक चोर की चोरी पकडे जाने पर उसको मारने से पिच्छे हटें होंगे ? तो ये लोग तो पुरे देश के लोगों की रजी रोटी के चोर हैं तो हम लोग चुप क्यों हें, आखिर क्यों ? क्यों हम लोग अपनी आवाज को" एक और आजादी की मांग की आवाज" नहीं बना लेते हैं . आजादी के ६३ वर्ष के बिताने बाद भी हम लोग कौन सी आजादी में जी रहे हैं . क्या ये आजादी है की मात्र २६ लोग देश की  पूरी जनता के मालिक  बने बैठे हैं . देश की सरकार , और देश की अदालत को भी वही ही चलतें हैं क्या इसी आजादी के लिए हमारे  महान पुरुषों ने अपनी  अपनी बलि दी थी की एक दिन फिर से हम लोग अपने ही लोगों की गुलामी की जंजीरों के कैदी बन सके. आखिर क्यों हम लोग इन लोगों के नाम नहीं जान सकते. क्या ये हमारे अधिकार में नहीं है ? या ये इन चंद (२६) काले धन के मालिकों ने संविधान को ही बदल दिया है . अब इसके आगे जो कुछ लिखने  जा रहे हूँ वो तो आज कल के समाचारों की सुर्खियाँ बना हुआ है लेकिन क्या हम आप सही में यही चाहतें थे,हैं ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?  ????????????                                                                                                                              280 लाख करोड़ का सवाल है ...
भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा"* ये कहना है स्विस बैंक के डाइरेक्टर का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग २८० लाख करोड़ रुपये (280 ,00 ,000 ,000 ,000) उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है.या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है. ऐसा भी कहसकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है. ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो ६० साल तक ख़त्म ना हो. यानी भारत को किसी वर्ल्ड बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है. जरा सोचिये ... हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नोकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी तक 2010 तक जारी है. इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रस्टाचार ने २८० लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल ६४ सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या  हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है. भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है. हमे भ्रस्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है.हाल ही में हुवे घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, २ जी स्पेक्ट्रुम घोटाला , आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले है ........आप लोग जोक्स फॉरवर्ड करते ही हो. इसे भी इतना फॉरवर्ड करो की पूरा भारत इसे पढ़े ... और एक आन्दोलन बन जाये ... सदियो की ठण्डी बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज् पहन इठलाती है। दो राह, समय
के रथ का घर्घर नाद सुनो,सिहासन खाली करो की जनता आती है। जनता? हां, मिट्टी की अबोध् मूर्ते वही, जाडे पाले की कसक सदा सहने वाली, जब् अन्ग अन्ग मे लगे सांप  हो चूस् रहे,