सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

बंद दिमाग की छोटी सोच : सपना महाशक्ति का

दुनियां की आठवीं सबसे बड़ी आर्थिक ताकत एवं तेजी से बढती आर्थिक स्थिति में दुसरे नंबर पर चल रहा भारत, क्यों अभी भी इतना पिछड़ा है की तीसरी दुनिया के देश का ठप्पा हटता ही नहीं . अख्रीर ऐसा क्या है की  तरकी कुछ खास जगहों पर ही नजर आती है .क्यों हम दूरदर्शी नहीं हैं और क्यों सरकारी नीतियों का मकडजाल हमें रोकता है तेजी से आगे बरने में . सबसे बड़ा कारन है हमारी तंग सोच और भष्टाचार . जहाँ हमें भविष्य की योजना बना कर उन्हें उत्साह से साकार करने में जुटना चाहिए, वहां  हम अतीत में झांककर गिला शिकवा करते रहतें हैं . कुछ गिने चुने राजनेताओं को छोड़ कर सब बस अतीत से चिपके हैं .सभी पुराने जख्मो को याद करके समाज और देश को भाषा , जातपात व् अमीरी -गरीबी के जाल से बाहर नहीं आने देना चाहते . क्यों अभी भी देश की आधी  आबादी गरीबी रेखा के निचे भूखो मर रही है और गोदामों में लाखो टन अनाज हर साल सड जाता है . दुनियां में दुसरे सबसे ज्यादा उपभोक्ता होने के बावजूद हम हर वस्तु के लए मारा मरी करतें हैं . इतने संसाधन होने के बावजूद क्यों हमारे लिए नाकाफी एवं महँगी उपलब्धता है ? हमारे देश की प्राकृतिक धरोहर का सबसे ज्यादा शोषण गलत रूप में क्यों होता है ? भ्रष्टाचार ने इस देश की जड़ें खोखली कर दी है . सरकार की नियत इसे काबू में करने या कोई कार्यवाही करने की तो बिलकूल नहीं है .क्या जनता के सब्र का पैमाना कभी नहीं भरेगा ? क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं की कितना भी बड़ा  अपराध हो रहा है बस यही सोच कर चुप बैठे रहें की "सब चलता है ". आज हर राजनेता, हर नौकरशाह, इतना डूब चूका है सत्ता और भ्रष्टाचार की वेत्रनी  में की कुछ हालत सुधरने के आसार नहीं हैं .
    बंद दिमाग की सोच अभी भी हर नेता को इस कदर जकडे है की हर निति ,हर योजना को वोट बैंक से जोड़कर ही बनाया जाता है लेकिन उसके दुगामी परिणामों पर किसी की नजर नहीं है . यही कारन है की हजारों योजनाओं पर अरबों खरबों खर्च होने के बावजूद देश में गरीबों की संख्या कम होने नाम नहीं ले रही है .सिर्फ योजना बनाने व् खर्च करने से काम नहीं चलने वाला , उन्हें ईमानदारी से कार्यान्वित भी करना होगा .
     वेसे तो हम इकिसविन शताब्दी में पहुँच चुके है लेकिन सोच अभी भी उनिसविन शताब्दी में ही  अटकी है . अभी भी हम जात पात , अमीरी गरीबी , उंच नीच ,भाषा , मजहब , प्रान्त की राजनीती से ऊपर नहीं सोच पते . हमारा समाज अभी भी परम्परा व् प्रगति की लड़ाई से जुज रहा है . अभी भी हम नै सोच और बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पते . अभी भी हमें लगता है की नै चीजें हमें रास नहीं आयेगी . संस्कारों का जाल अभी भी हमें इस कदर जकडे है की हम समज ही नहीं पाते की कौन सी रीती हमें आगे आने से रोकतीं है या कौन सी परम्परा अब बदलनी चाहिए .दुविधा या बंद दिमाग की सोच के चल;ते हम बीते हुए कल के कारन आज का आनंद नहीं ले पाते और भविष्य के बारे में आशंकित रहते हैं .हमें अपने अतीत से सबक ले कर आज में भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए .
   हम अपने अतीत से इतना प्रभावित हैं की हर नै चीज हमारे वेदों और पुरानो की खोज बताते हुए उसका श्रय लेने की कोशिश में रहते है . जब हमारे बेद पुराण वास्तव में इतने शानदार हैं की वो उनकी रह पर चलकर खुद क्यों नहीं खोज कर लेते , क्यों हम दूसरी की खोज को अपनी कहने की आदत पाले हुए हैं . हमारी यही सोच  ही हमें पीछे रखने में मजबूर करती है .
     समय आ गया है की हम भी कुछ नया  सोचें और आगे बढे . कब तक हम दूसरों की नक़ल करते रहेगें और विकासशील देशों की श्र्य्नी में रहेंगे . अब समय विकसित बनाने का आ गया है . इतने प्रयसों और संसाधनों के बाद भी भी हम अगर नहीं आगे बढ़ प् रहे हैं तो जरुर हमें अपनी रण निति बदलनी होगी और इसके लिए हमें सबसे पहले बदलना होगा अपने सोचने का तरीका . अब पिछली बैटन रोना छोड़ कर आगे की बातें सोचना चाहिए और छोरना चाहिय अतीत से चिपकने का मोह . सढी गली मान्यताओं को दफनाकर व्यवहारी चीजें अपनाना अब जरुरी हो गया हे . मान्यताएँ एक हद तक ही अच्छी लगती है अगर वह हमें भविष्य में मदत करें तो , नाकि हमारी तरकी में रोड़ा बने .