गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविन्द केजरीवाल की धमाकेदार

आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविन्द केजरीवाल की धमाकेदार , या यूँ कहे विलक्षण ऐतिहासिक जीत ने जहाँ एक और भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्त नेतृत्व  यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी के आत्मा विशवास की चूलें हिला दी हैं वहीँ  दूसरी तरफ भाजपा के अध्यक्ष और अभी तक देश के कई राज्यों के चुनाओं में अपनी योग्य कार्यक्षमता से  भाजपा को ताल ठोककर विजय श्री दिलाने वाले मोदी के ख़ास चहेते अमित शाह को भी मात देने का काम किया है. पिछले ९ महीने से सत्ता के नशे में चूर और राजनैतिक आत्मविश्वास से सर से पैरों तक सराबोर अमित शाह ने शायद सपनों में भी कभी सोचा नहीं होगा की भारत की राजधानी दिल्ली में उन्हें इस कदर , राजनीती के नौसिखिया और मात्र दो वर्ष पुराने दल के मुखिया से मुह की खानी पड़ेगी. इस हकीकत में भी कोई दो राय नहीं है की यदि हम सिक्किम के नतीजों को छोड़ दें तो हिंदुस्तान के इतिहास में आम आदमी पार्टी वास पहला राजनैतिक दल है जिसने इतने बड़े पैमाने पर यानि ९६ फीसदी सीटें जीतकर रिकॉर्ड कायम किया है. मात्र दो वर्षों के छोटे से अंतराल के दौरान निरंतर दो मर्तबा बतौर मुखिया मंत्री सत्ता पर काबिज होने वाले केजरीवाल वह विलक्षण शख्सियत हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले  आई आर एस की महत्वपूर्ण नौकरी छोड़कर , दिल्ली के झुग्गी झोंपड़ी बस्ती में रहकर परिवर्तन नाम की गैर सरकारी संस्था के माध्यम से गरीबों की सेवा की, बाद में अन्ना  के जनलोकपाल आंदोलन के मार्फत देश भर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा और फिर अपने राजनैतिक पार्टी बनाकर दो वर्षों के निरंतर संघर्ष के बाद सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस और छे सात दशक पुरानी भाजपा, जो पहले जनसंघ थी को दिल्ली में चारों खाने चित कर धराशाई कर दिया. दिल्ली के इस चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार ने निसंदेह मोदी साहिब की निरंतर  बढ़ती लोकप्रियता पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लगाया है हालाँकि भाजपा के शीर्ष नेता इस बात  को नहीं मानते . इस चुनावी सुनामी में भाजपा के तमाम दिल्ली क्षत्रप बुरी तरह चुनाव हार गए यहाँ तक की इनकी मुख्यमंत्री प्रत्याशी जो देश की पहली आई पी अस्स अधिकारी थी और समाज में ईमादारी का रुतबा रखती थी भी अपनी सीट नहीं बचा पायी. दरअसल , दिल्ली के इस चुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को सबक सिखाया है. ये सबक था इन दलों के नेताओं का जमीनी पार्टी कार्यकर्ताओं से संपर्क टूटने का, इनमे अहम आने का, इनका और इनकी पार्टी का अकूत भ्रस्टाचार में पूरी तरह सराबोर होने का और इनके रवैये में अहंकार और अर्रोगन्स के आने का. एक तरफ जहाँ भारतीय जनता पार्टी जनता के जड़ जमीन के मुद्दों को अपने पक्ष में नहीं भुना पायी वाही दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल ने मुफ्त या आधे दामो पर  बिजली पानी , फ्री वई फाई देने, दिल्ली के हजारों ठेके के कर्मचारियों और होम गार्ड के जवानों को पक्का करने जैसी अनेकों घोषणाओं को अविलम्ब पूरा करने के अपने वायदों से जनता का दिल जीत लिया और कांग्रेस के लाखों लाख झुग्गी झौंडी बस्तियों , उनऑथोराइज़ कालोनियों के वोट अपने कब्जे में कर लिय. नतीजतन उन्हें ६७ विधान सभा सीटों में जीत का ऐतिहासिक बहुमत मिला जबकि भाजपा को मात्र तीन सीटों पर ही सिमटने को मजबूर होना पड़ा. कांग्रेस तो शुन्य पर ही चली गयी. दरअसल , भाजपा को उनके शीर्ष नेतृत्व के बड़बोलेपन ने भी जमीन दिखाई. मसलन मोदी साहब ने अपने भाषणों में केजरीवाल को बदकिस्मत और नक्ससली तक कह डाला. और ऊपर से भजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने काले धन पर मोदी शब द्वारा संसदीय चुनावों में हर हिंदुस्तानी के खाते में आने वाले १५ लाख की रकम को ये कहकर झुटला दिया की ये तो मोदी साहब का झोटा बयान था , मात्र चुनावी जुमले जिसे लोगों ने ये समझा की इसके मायने तो ये हुए की प्रधानमंत्रीजी के अभी तक के सभी आश्वासन खोरे झूट और सिर्फ छुनवी जुमले ही होंगे. यही नहीं बल्कि किरण बेदी को ऊपर से टपका कर मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित कर भी भाजपा नेतृत्व ने भरी जोखिम मोल लिया क्योंकि किरण बेदी अपने बड़बोलेपन के चलते तो फ़ैल हुई ही लेकिन उनके अचानक आने से पार्टी के दिल्ली स्तर के नेता स्वयं को राजनैतिक तौर पर असुरक्षित महसूस करने लगे, ख़ास कर वे नेता भीतर ही भीतर  जो वर्षों से मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब  संजोये बैठे थे.  इसके ऊपर कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी से डेफेक्शन को इंजीनियर कराकर बहरी नेताओं को पार्टी में लाकर टिकेट देना भी भाजपा के लिए व्यापक पैमाने पर अहितकर हुआ. इसका बुरा नैनीता ये निकला की भाजपा का वोट बैंक ४३ फीसदी से घटकर ३२ फीसदी तक पहुंच गया और कांग्रेस २५ फीसदी से सिमटकर १० फीसदी तक पहुंच गयी जबकि आम आदमी पार्टी को ५६ फीसदी वोट बैंक हासिक हो गया जो अपने आप में ऐतिहासिक था. इसके अलावा देश के तमाम गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई दलों जैसे आर जे दी, जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन ने भी आप के वोट बैंक को बढ़ाने का काम किया. कुल मिलकर यदि ये कहा जय की आप और केजरीवाल को मिली ये जीत सदी की सबसे बड़ी जीत है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी क्यों मात्र दो वर्षों के अल्पकाल में पैदा हुईं पार्टी के ये चौकाने वाले नतीजे निसंदेह न सिर्फ हर दृष्टि से हैरतअंगेज थे बल्कि उनपेक्षित भी थे. किसी ने कभी भी ऐसे नतीजों की शयद उम्मीद नहीं की होगी. कहिर जो भी हो अब केजरीवाल के सामने चुनौतियाँ असंख्य हैं और जनता की उनसे अपेक्षाएं भी अनगिनत हैं. देखना होगा की वे  अब इस अब्सोलुत मेजोरिटी के चलते किस आत्मविश्वास के साथ अपना साशन चलते हैं और कितनी तेजी और खारेपन के साथ जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतारते हैं. हाँ इतना अवश्य है, की इस जीत ने आम आदमी पार्टी के लिए राष्ट्रीय स्तर की राजनीती के किये भी दरवाजे खोल दिए हैं और देश के अन्य राज्यों में भी गरीब, असहाय, पीड़ित और कुंठित जनता और युवा उनका खुले दिल से इंतज़ार कर रही है. बस जरुरत इस बात की है की दिल्ली में आने वाले समय में अरविन्द केजरीवाल कैसे परफॉर्म करते हैं.
सुनील नेगी
अध्यक्ष 
उत्तराखंड जर्नलिस्ट्स फोरम